क्या यह हुसैनियत है?
नवासा ए रसूल, जिगरगोशा-ए-बतूल हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की ज़ात हक़, सच्चाई, शुजाअत और क़ुर्बानी की अज़ीम अलामत है। कर्बला का अज़ीम वाक़िआ इस्लामी तारीख़ का ऐसा रौशन बाब है जिसने सच्चाई की रस्सी को मज़बूती से पकड़े रहने, हक़ के मुक़ाबले में डट जाने और शरीअत-ए-मुतह्हरा की हिफ़ाज़त व एहतराम के लिए जान व औलाद की क़ुर्बानी पेश करने का दर्स दिया है।
लेकिन अफ़सोस! आजकल कुछ लोग हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के नाम पर ऐसे काम करने लगे हैं जिनके ख़िलाफ़ इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को अपनी और अपने ख़ानदान वालों की क़ुर्बानी पेश करनी पड़ी थी। हुसैनी होने का दावा करने वाले ख़ुद उसी राह पर चलने लगे हैं जिस राह को बंद करने के लिए इमाम हुसैन को मैदान में आना पड़ा। जिस शरीअत-ए-मुतह्हरा की हिफ़ाज़त के लिए हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने क़ुर्बानी पेश की, आज उन्हीं के नाम पर उसी शरीअत के अहकाम की ख़िलाफ़वर्ज़ी की जा रही है।
मुहर्रमुल हराम के अय्याम में न जाने कितने अपने आपको हुसैनी कहलाने वाले हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के नाम पर ढोल-बाजे बजाते नज़र आएंगे, जबकि शरीअत-ए-मुतह्हरा में ढोल-बाजे को नाजायज़ व हराम क़रार दिया गया है। हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के नाना जान सरकार-ए-दो जहाँ सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम का फ़रमान-ए-आलिशान है: "मेरे रब ने मुझे बांसुरी और गाने-बाजे के आलात को तोड़ने का हुक्म दिया है।" (मुस्नद इमाम अहमद बिन हम्बल)
दूसरी जगह मुख़्तार-ए-कायनात सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही व अस्हाबिही वसल्लम का इरशाद है: "अल्लाह तआला ने शराब, जुआ और कूबह (ढोल) को हराम किया और फ़रमाया: हर नशा देने वाली चीज़ हराम है।" (सुननुल कुबरा लिल बैहक़ी, किताबुश शहादात)
मुहर्रमुल हराम में इमाम हुसैन के नाम पर जगह-जगह मुख़्तलिफ़ तरह के ताज़िए बनाए जाते हैं और उन पर तरह-तरह के ग़ैर-शरई काम किए जाते हैं। इसके साथ ज़ोर-ज़ोर से ढोल पीटा जाता है, ताशे बजाए जाते हैं, बेपर्दा ख़वातीन का हुजूम भी सड़कों पर निकल आता है। वे बेपर्दा औरतें फ़ख़्र के साथ ताज़िए पर चढ़ावा चढ़ाती हैं। मर्द हज़रात भी इसमें शरीक होते हैं और अपने बच्चों को भी साथ लाते हैं ताकि जाहिलों का तमाशा अपने छोटे बच्चों को दिखाकर उनका गुनाह भी अपने सिर लें।
नज़्र-ओ-नियाज़ जैसी बाबरकत चीज़ को छतों से फेंका जाता है, रिज़्क़ की बे-हुरमती होती है। इस तरह के न जाने कितने ग़ैर-शरई काम किए जाते हैं। बल्कि सही बात तो यह है कि ताज़िए बनाकर इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के नाम पर कमाई का धंधा खोल लिया जाता है। शरीअत-ए-मुतह्हरा ने मुरव्वजा ताज़ियादारी को नाजायज़ क़रार दिया है।
हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी अलैहिर्रहमा फ़रमाते हैं: "अशरा-ए-मुहर्रम में ताज़ियादारी और ताज़िए या क़ब्रों की सूरत बनाना जायज़ नहीं है।" (फ़तावा अज़ीज़िया, सफ़हा 72, मतबूआ दिल्ली)
7 मुहर्रमुल हराम से लेकर 10 मुहर्रमुल हराम तक जगह-जगह सड़कों पर तरह-तरह के ग़ैर-शरई काम इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के नाम पर किए जाते हैं। कहीं कुएँ में चीनी डाली जाती है, कहीं किसी जगह के चक्कर लगाए जाते हैं, कहीं अलम या ताज़िए पर मेवे चढ़ाए जाते हैं, जिनमें मर्दों के साथ अक्सर बेपर्दा औरतें भी होती हैं।
सड़कों पर आवारा लड़कों का हुजूम, उनका लड़कियों को ताकना-झाँकना, जवान लड़कियों का बन-संवरकर निकलना और बदनिगाही के लिए उकसाना, जगह-जगह ढोल, बाजे और ताशे की धुन पर रक़्स जैसी हालत बनाना और न जाने कितने ऐसे काम हैं जिन्हें देखकर हर दर्दमंद और बाशऊर इंसान के दिल से एक ही बात निकलती है कि यह हुसैनियत नहीं है।
हुसैनियत तो नाम है शरीअत की पासदारी का।
हुसैनियत तो नाम है सुन्नत-ए-मुस्तफ़ा की पैरवी का।
हुसैनियत तो नाम है ढोल-बाजे और ताशे से ख़ुद भी दूर रहने और दूसरों को भी रोकने का।
हुसैनियत तो नाम है बेहयाई और बुराइयों से रुकने का।
इन तमाम हरकतों को करने वाला कितने ही दावे कर ले, वह सच्चा हुसैनी नहीं हो सकता।
अब यह हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के नाम पर ढोल बजाने वाले सोचें कि क्या वे हुसैनियत का काम कर रहे हैं या यज़ीदियत का? क्योंकि शरई मुख़ालिफ़ कामों में यज़ीद आगे था, इसी लिए हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने उसकी बैअत नहीं फ़रमाई। शरीअत-ए-मुतह्हरा के अहकाम की ख़िलाफ़वर्ज़ी यज़ीद ने की थी, जबकि इमाम हुसैन ने उसी शरीअत की हिफ़ाज़त के लिए अपनी जान की क़ुर्बानी पेश की। और आज उन्हीं के नाम पर उसी शरीअत के ख़िलाफ़ काम किए जा रहे हैं।
हुसैनी होने का सिर्फ़ दावा बेकार है, बल्कि सच्चा हुसैनी बनने के लिए हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने जो दर्स दिया है उस पर अमल करना होगा। हज़रत इमाम हुसैन की सीरत और उनकी तालीमात को पढ़ना होगा।
जब आप हज़रत इमाम हुसैन की सीरत को पढ़ेंगे तो आप पर यह बात वाज़ेह हो जाएगी कि आपकी सीरत का एक अहम पहलू यह है कि आपने हर हाल में सुन्नत-ए-नबवी को इख़्तियार फ़रमाया और कभी भी शरीअत-ए-मुस्तफ़ा के दामन को हाथ से छूटने नहीं दिया। आपकी इबादत, मुआमलात, अख़लाक़ और तर्ज़-ए-ज़िंदगी सब कुछ हुज़ूर नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के नक़्शे-क़दम पर था।
इसलिए जो शख़्स हज़रत इमाम हुसैन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु से सच्ची मुहब्बत रखता है, उसकी मुहब्बत का असर उसकी नमाज़, उसके अख़लाक़, उसके मुआमलात और सुन्नत-ए-मुस्तफ़ा पर अमल करने में नज़र आना चाहिए। अगर मुहब्बत महज़ रस्मी नारों तक महदूद हो जाए तो वह अपने मतलूबा समरात हासिल नहीं कर पाती।
वाक़िआ-ए-कर्बला हक़ को बातिल पर और शरीअत-ए-मुतह्हरा के तहफ़्फ़ुज़ को ज़ाती मुफ़ाद पर तरजीह देने का दर्स देता है। ज़रूरत इस बात की है कि इस दर्स को समझा जाए और अपनी तर्ज़-ए-ज़िंदगी को तालीमात-ए-इमाम हुसैन की रौशनी में ढाला जाए।