ईदे ग़दीर की शरई हैसियत - तौहीद अहमद ख़ान रज़वी | Islamic Article | Tehseeni Foundation
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ईदे ग़दीर की शरई हैसियत

तौहीद अहमद ख़ान रज़वी

ईदे ग़दीर की शरई हैसियत
📅 04 Jun 2026 👁 193 Views

ईदे ग़दीर की शरई हैसियत

18 ज़िलहिज्जा को एक गिरोह एक ऐसी ईद मनाता है जिसकी इस्लामी तारीख़ और शरीअत-ए-मुतह्हरा में कोई अस्ल नहीं है। इस ईद-ए-ग़दीर का बानी इराक़ी शिया हाकिम मुइज़ुद्दीन अहमद बिन अबूयाह दैलमी है। सबसे पहले उसने राफ़िज़ियों के साथ 18 ज़िलहिज्जा 352 हिजरी को बग़दाद में ईद-ए-ग़दीर मनाई।

नीज़, ईद-ए-ग़दीर इस नियत से मनाना कि मौला अली कर्रमल्लाहु वजहहुल करीम को खलीफ़ा बिला फ़स्ल बनाया गया था, यह रवाफ़िज़ की बिदअत-ए-सय्यिआ व शनीआ है, जो सरासर बातिल और गुमराही पर मुबतला है। मुसलमानों को इससे बचना ज़रूरी है।

शिया ईद-ए-ग़दीर क्यों मनाते हैं?

ग़दीर-ए-खुम पर हुज़ूर नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने हज़रत अली कर्रमल्लाहु तआला वजहहुल करीम के बारे में फ़रमाया:

"जिस का मैं मौला हूँ, अली भी उसके मौला हैं।"

शिया गिरोह इस हदीस से हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की ख़िलाफ़त-ए-बिला फ़स्ल साबित करते हैं और इस दिन को ईद मनाते हैं। उनका इस हदीस से हज़रत अली कर्रमल्लाहु वजहहुल करीम को खलीफ़ा बिला फ़स्ल मानना सरासर ग़लत है और दूसरी हदीसों के खिलाफ़ है।

ग़दीर-ए-खुम पर हुज़ूर के इस फ़रमान का पस-ए-मंज़र यह था कि रमज़ानुल मुबारक 10 हिजरी में नबी पाक सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि वसल्लम ने मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को माल-ए-ग़नीमत का ख़ुम्स यानी पाँचवाँ हिस्सा वसूल करने के लिए यमन की तरफ़ एक लश्कर का अमीर बनाकर भेजा था। फिर नबी पाक सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि वसल्लम हज्जतुल विदा के लिए मक्का मुकर्रमा तशरीफ़ ले आए। यहीं क़ियाम के दौरान मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु भी मक्का मुकर्रमा पहुँच गए और ख़ुम्स नबी पाक सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि वसल्लम की बारगाह में पेश किया।

इस सफ़र में मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के कुछ साथियों को आपके कुछ फ़ैसलों से इख़्तिलाफ़ हुआ। सफ़र से वापसी पर उन्होंने नबी करीम सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि वसल्लम की बारगाह में इसकी शिकायत की। इस पर नबी पाक सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिहि वसल्लम ने ग़दीर-ए-खुम के मुक़ाम पर ख़ुत्बा इरशाद फ़रमाया, जिसमें मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के उन फ़ैसलों को दुरुस्त क़रार दिया और उनके साथ मुहब्बत व अकीदत का मामला रखने और बदगुमानी से बचने की ताकीद फ़रमाई।

मुस्तदरक में है:

हज़रत बुरैदह असलमी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु बयान करते हैं कि मैं मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के साथ यमन गया। मैंने उनमें कुछ ऐसी बात देखी जो मुझे पसंद न आई। जब मैं रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बारगाह में हाज़िर हुआ तो मैंने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु के बारे में कुछ शिकायत की। इस पर रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का चेहरा मुबारक बदल गया और आपने फ़रमाया: "ऐ बुरैदह! क्या मैं मोमिनों पर उनकी जानों से ज़्यादा हक़ नहीं रखता?" मैंने अर्ज़ किया: क्यों नहीं, या रसूलल्लाह! तब आपने फ़रमाया: "जिसका मैं मौला हूँ, अली भी उसके मौला हैं।"

मज़कूरा तफ़सील से यह बात वाज़ेह हो गई कि ग़दीर-ए-खुम के मुक़ाम पर हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का मक़सद मौला अली रज़ियल्लाहु अन्हु की इमामत व ख़िलाफ़त को बयान करना नहीं था, बल्कि उन शुबहात का इज़ाला करना था जो कुछ लोगों के ज़ेहन में पैदा हो गए थे।

लिहाज़ा हदीस में लफ़्ज़ "मौला" से मुराद "खलीफ़ा बिला फ़स्ल" नहींबल्कि दोस्त, महबूब और मददगार है।

यही मफ़हूम सुनने कुबरा और इमाम अहमद बिन हम्बल की किताब फ़ज़ाइले सहाबा और हदीस की दूसरी किताबों में भी है।

अल्लामा मुल्ला अली क़ारी इस हदीस की शरह में लिखते हैं:

"मन कुन्तु मौलाहु फ़अलिय्युन मौलाहु"। कहा गया है कि इसका मतलब यह है कि जिससे मैं दोस्ती रखता हूँ, अली भी उससे दोस्ती रखते हैं। यहाँ वली का अर्थ दुश्मन के मुकाबले में दोस्त है। यानी जिससे मैं मुहब्बत करता हूँ, अली भी उससे मुहब्बत करते हैं। और यह मतलब भी किया गया है कि जिसने मुझसे दोस्ती रखी, अली भी उससे दोस्ती रखते हैं। हमारे शारिहीन उलेमा ने भी यही ज़िक्र किया है।

तरजुमा:
"जिसका मैं मौला हूँ, अली भी उसके मौला हैं।" कहा गया है कि इसके मानी हैं: जिससे मैं दोस्ती रखता हूँ, अली भी उससे दोस्ती रखते हैं। दोस्त, दुश्मन के मुकाबले में होता है। यानी जिससे मैं मुहब्बत करता हूँ, अली भी उससे मुहब्बत करते हैं। और यह मानी भी किए गए हैं कि जिसने मुझसे दोस्ती रखी, अली भी उससे दोस्ती रखते हैं। हमारे शारिहीन उलेमा ने भी ऐसा ही ज़िक्र किया है।


इस हदीस से मौला अली की इमामत पर इस्तिदलाल करने वाले शियाओं का रद्द करते हुए मुल्ला अली क़ारी रहमतुल्लाहि अलैह लिखते हैं:

शियाओं ने कहा कि हज़रत अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु मुतसर्रिफ़ (इख़्तियार रखने वाले) हैं। उनका कहना है कि इस हदीस का मतलब यह है कि हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु हर उस मामले में तसर्रुफ़ का हक़ रखते हैं जिसमें रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम को तसर्रुफ़ का हक़ हासिल था। और उनमें मोमिनों के मामले भी शामिल हैं, इसलिए वह उनके इमाम हुए।

मैं कहता हूँ कि विलायत को उस इमामत पर महमूल करना, जो मोमिनों के मामलों में तसर्रुफ़ का नाम है, दुरुस्त नहीं है। क्योंकि अपनी ज़िन्दगी में मुस्तक़िल मुतसर्रिफ़ सिर्फ़ नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि वसल्लम ही थे, कोई और नहीं। इसलिए इस हदीस को मुहब्बत, इस्लामी दोस्ती और इसी तरह के दूसरे मआनी पर महमूल करना वाजिब है।

(मिरक़ातुल मफ़ातीह, शरह मिश्कातुल मसाबीह, किताबुल मनाक़िब, बाब मनाक़िब अली रज़ियल्लाहु अन्हु, 11/247)


इस हदीस के बारे में तशरीह करते हुए हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाहि अलैह फ़रमाते हैं:

"मौला" के मानी दोस्त, मददगार, आज़ाद किया हुआ गुलाम, और आज़ाद करने वाला होते हैं। इसके मानी खलीफ़ा या बादशाह नहीं हैं।

कुरआन शरीफ़ में अल्लाह तआला फ़रमाता है:

तो बेशक अल्लाह उनका मददगार है और जिब्राईल और नेक ईमान वाले।"

शिया कहते हैं कि "मौला" का मतलब खलीफ़ा है और इस हदीस से यह लाज़िम आता है कि हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु के अलावा कोई खलीफ़ा नहीं, बल्कि आप खलीफ़ा-ए-बिला फ़स्ल हैं।

मगर यह कई वजहों से ग़लत है:

पहली वजह:
"मौला" कभी भी खलीफ़ा या औला-बिल-ख़िलाफ़त के मानी में इस्तेमाल नहीं होता। बताइए, अल्लाह तआला और हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम किसके खलीफ़ा हैं? जबकि कुरआन में उन्हें भी "मौला" कहा गया है।

दूसरी वजह:
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम किसी के खलीफ़ा नहीं हैं, तो फिर "मन कुन्तु मौलाहु" के क्या मानी होंगे?

तीसरी वजह:
हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु, हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की ज़ाहिरी ज़िन्दगी में खलीफ़ा नहीं थे, जबकि यह फ़रमान उसी ज़िन्दगी में दिया गया था। इसलिए यहाँ मौला का मतलब खलीफ़ा नहीं हो सकता।

चौथी वजह:
अगर मान भी लिया जाए कि मौला का मतलब खलीफ़ा है, तब भी इससे बिला फ़स्ल ख़िलाफ़त कैसे साबित होगी? आप खलीफ़ा तो हैं, मगर अपने वक़्त और अपने दौर में।

पाँचवीं वजह:
अगर यहाँ मौला का मतलब खलीफ़ा होता, तो सक़ीफ़ा बनी साअिदा में जब हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने अंसार से फ़रमाया कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है: "अल-ख़िलाफ़तु फ़िल-क़ुरैश" (ख़िलाफ़त क़ुरैश में होगी), तो उस वक़्त हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने यह हदीस पेश क्यों न की कि मुझे तो रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ख़िलाफ़त दे गए हैं? बल्कि आप ख़ामोश रहे और बाद में तीनों खुलफ़ा के हाथ पर बैअत भी की। इससे मालूम हुआ कि आपकी नज़र में भी यहाँ मौला का मतलब खलीफ़ा नहीं था।

छठी वजह:
हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के मरज़े-विसाल के दौरान हज़रत अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु ने हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु से कहा कि चलिए, रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से अपने लिए ख़िलाफ़त तलब कर लें। हज़रत अली रज़ियल्लाहु अन्हु ने इंकार कर दिया। अगर यहाँ मौला का मतलब खलीफ़ा होता तो फिर यह मशविरा कैसा?

सातवीं वजह:
ख़िलाफ़त साबित करने के लिए राफ़िज़ियों को ऐसी दलील चाहिए जो क़तई उस्सुबूत और क़तई दलालत वाली हो। जबकि यह हदीस न तो क़तई उस्सुबूत है, क्योंकि यह ख़बर-ए-वाहिद है, और न ही क़तई दलालत, क्योंकि "मौला" के बहुत से मानी हैं और कहीं भी इसका मतलब खलीफ़ा नहीं आता।

(मिरआतुल मनाजीह, शरह मिश्कातुल मसाबीह, जिल्द 8, सफ़्हा 353-354)

हज़रत अली को खलीफ़ा बिला फ़स्ल मानना

शिया गिरोह के लोग हज़रत अली कर्रमल्लाहु तआला वजहहुल करीम को खलीफ़ा बिला फ़स्ल मानते हैं, जो अहादीस के खिलाफ़ है। हम यहाँ कुछ अहादीस पेश करते हैं जिनसे हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के खलीफ़ा-ए-अव्वल होने का सुबूत मिलता है।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

किसी क़ौम को ज़ेबा नहीं देता कि अबू बक्र की मौजूदगी में कोई और इमामत करे।

रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया:

" मेरे बाद अबू बक्र और उमर (रज़ियल्लाहु अन्हुमा) की पैरवी करना।

सहीह बुख़ारी में हज़रत इब्ने उमर रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं:

"हम नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के ज़माने में लोगों में फ़ज़ीलत के एतिबार से अबू बक्र, फिर उमर, फिर उस्मान रज़ियल्लाहुन्हुम को सबसे अफ़ज़ल समझते थे।"

हज़रत अली को खुलफ़ाए सुलासा से अफ़ज़ल कहने वाले पर हुक्म

राफ़िज़ियों में जो शख़्स मौला अली रज़ियल्लाहु तआला अन्हु को खुलफ़ाए सुलासा (हज़रत अबू बक्र, हज़रत उमर और हज़रत उस्मान रज़ियल्लाहु अन्हुम) से अफ़ज़ल कहे, वह गुमराह है। और अगर हज़रत सिद्दीक़े अकबर या हज़रत फ़ारूक़े आज़म रज़ियल्लाहु तआला अन्हुमा की ख़िलाफ़त का इंकार करे तो काफ़िर है।
 
फ़तावा रज़विया में वजीज़ के हवाले से इमामे अहले सुन्नत तहरीर फ़रमाते हैं:
 
"मन अंकरा ख़िलाफ़ता अबी बक्रिन रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फ़हुवा काफ़िरुन फ़िस्सहीह, व मन अंकरा ख़िलाफ़ता उमर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फ़हुवा काफ़िरुन फ़िल असह्ह।"
 
यानी, हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की ख़िलाफ़त का इंकार करने वाला काफ़िर है, यही सही क़ौल है। और हज़रत उमर फ़ारूक़ रज़ियल्लाहु तआला अन्हु की ख़िलाफ़त का इंकार करने वाला भी काफ़िर है, यही ज़्यादा सही क़ौल है।
(फ़तावा रज़विया, जिल्द 14, सफ़्हा 250-251, रज़ा फ़ाउंडेशन)

ख़ुलासा-ए-कलाम

ख़ुलासा यह है कि ईद-ए-ग़दीर मनाना राफ़िज़ियों का तरीक़ा है। अहले सुन्नत व जमाअत की आवाम को चाहिए कि वह उनके झाँसे में आकर उनके तौर-तरीक़ों को न अपनाएँ।

18 ज़िलहिज्जा इस्लाम के तीसरे खलीफ़ा हज़रत उस्मान ग़नी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु का यौमे शहादत भी है। इसलिए हज़रत उस्मान ग़नी रज़ियल्लाहु अन्हु के नाम की महफ़िलें मुनअक़िद करें और उसमें हज़रात शैख़ैन करीमैन, हज़रत उस्मान ग़नी, मौला अली और अहले बैत किराम रज़ियल्लाहु अन्हुम की बारगाह में ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करें।

याद रखें! हर तरफ़ ईमान के लुटेरे घूम रहे हैं। अपने ईमान और अक़ीदे की हिफ़ाज़त करते हुए नेक आमाल करते रहें।

अल्लाह तआला हम सबके ईमान व अक़ीदे की हिफ़ाज़त फ़रमाए। आमीन।

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